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Tuesday, December 6, 2022

ना यह मंजिल तेरी
ना यह चाहत तेरी
ये देख ये देख "पाशा"
तेरे दोस्त यही.
इंतज़ार ही इंतज़ार नसीब है,
हम रखते है काफिला वहां,
लोग समझते मुसीबतों का दीवाना है.

Wednesday, October 28, 2015

एक बात जो कल कही,
दुखा गयी वो कल कही

थम गया है सिलसिला,
बात-ए-सुखन कल कही 

ऐसे ना  मेरे थे ज़ज्बात,
दोस्त बदला है कल कही 

ना उमीद कर दिया तूने,
शहर ने बात जो कल कही 

तू ही तू है जहन में मेरे,
कैसे यह तूने कल कही 

ना हो शरीक-ऐ-सुखन  "पाशा",
दर्द-ऐ-दिल बढ़ा जो कल कही 

Thursday, September 1, 2011

मोहब्बत

मेरा जज्बे मोहब्बत, कम न होगा,
जहान-ऐ-आरजू, बरहम न होगा.

बढेगा मेरी, दुनिया में उजाला,
चराग-ऐ-सोजे गम, मधम न होगा.

जहान-ऐ-आबो गिल से, और मावरा भी,
तेरा दर्द-ऐ-मोहब्बत कम न होगा.

तेरे दर पे जो, सरख़म हो गया है,
वो अब दुनिया के आगे ख़म न होगा.

लडूंगा गर्दिश-ऐ-दौरा से हरदम,
मेरा जोशे-ऐ-अमल अब कम न होगा.

Wednesday, June 29, 2011

Shayari Sach Bolati hain

लाख परदों में रहूँ
भेद मेरे खोलती हैं
शायरी सच बोलती हैं.
मैंने देखा हैं की
जब मेरी जबा डोलती हैं
शायरी सच बोलती है

तेरा इसरार के
चाहत मेरी बेताब न हो
वाकिफ-ऐ-ग़म से मेरा
हल्का-ऐ-एहबाब न हो
तू मुझे जब्त के
सहेरा में क्यों रोलती हैं
शायरी सच बोलती है

ये भी क्या बात के
छुप-छुप के तुझे प्यार करू
गर कोई पूछ ही बैठे तो
मैं इनकार करू
जब किसी बात को
दुनिया की नज़र तोलती हैं
शायरी सच बोलती हैं

मैंने इस फ़िक्र में काटी
कई राते कई दिन
मेरे शेरो में
तेरा नाम ना आये लेकिन
जब तेरी सांस
मेरी सांस में रस घोलती हैं
शायरी सच बोलती हैं

तेरी जलवो का हैं
परतो मेरी इक इक ग़ज़ल
तू मेरे जिस्म का साया है
तो कतरा के ना चल
परदादारी तो खुद अपनाही
भरम खोलती हैं
शायरी सच बोलती हैं 

Friday, April 8, 2011

खैरियत की दूवाँ

मैंने मांगी है दूवाँ,
तेरे खैरियत की,
खुश रहे तू सदा,
खुश ही रहने की.

तूने जो अंजाम दिया,
उस में ना जल जाने की.

मेरा जो है यहाँ,
तुझ को मिल जाने की.

दर्द-ऐ-एहसास नहीं,
ये सिला भी भूल जाने की.

"पाशा" अब बीत गये,
दिल सुहाने दिन होने की.

ग़मगीन ख़ुशी

हैरत में हूँ मैं पड़ा,
क्यु तुझसे हूँ जुदा.

अब दुरी जिंदगी भर की,
किस उलझन में हूँ खड़ा.

ये रास्ते कट ही जायेंगे,
ग़मगीन ख़ुशी में सदा.

दस्तूर-ऐ-दुनिया है तू,
नाउम्मीदों में मैं डूबा.

सोचना पड़ा

दिल उनसे जा मिला,
तो मुझे सोचना पड़ा,
एक सिलसिला चला,
तो मुझे सोचना पड़ा.

उनसे वफाए की,
तो बुरा मानने लगे,
करने लगे गिला,
तो मुझे सोचना पड़ा.

वो तो जरासी बातपे,
नाराज़ हो गए,
जब ऐसा गुल खिला,
तो मुझे सोचना पड़ा.

झगड़ा तो हुस्नो इश्क में,
होता ही है मगर,
आया जो फासला,
तो मुझे सोचना पड़ा.

बनके भी मेरे,
बन ना सके संगदिल सनम,
ऐसा मिला सिला,
तो मुझे सोचना पड़ा.

Wednesday, February 16, 2011

ये जिंदगी

ये जिंदगी,
जिये जा यु ही,
मर-मर के रातोंको,
पीये जा यु ही.

याद आते है,
वो गुज़रे ज़माने,
भूल के वो पल,
जिये जा यु ही.

कौन है यहाँ,
तेरा अपना पराया,
ये रोना छोड़ के,
हँसे जा यु ही.

अब के बाद-ऐ-सबा,
ज़ुल्म करती हमपर,
ये भी सही तो,
सहे जा यु ही.

तुझसे मिलते जो,
कब थे तेरे यहाँ,
यह तेरा भरम "पाशा",
रखे जा यु ही.

Saturday, February 5, 2011

लोग

कल जो लोग अपने थे,
आज वो क्यू पराये है ?

दिल में अपने बसते थे,
आज वो क्यू रुलाते है ?

मिल के कभी हसते थे,
आज वो क्यू कतराते है ?

दोस्ती पे नाज़ रखते थे,
आज वो क्यू शरमाते है ?

ये कैसी रंजिश है "पाशा"
आज वो क्यू वहशी है ?

Thursday, January 27, 2011

मै और मेरा महखाना

तुम मत यह कहना,
छोड़ दो ये पीना,
मै और मेरा महखाना.

यहाँ कोई दर्द न छुएं,
न हो कोई अहसास पुराना,
मै और मेरा महखाना.

लगे यहाँ दोस्तों का हुजूम,
न हो कोई दुश्मन हमारा,
मै और मेरा महखाना.

दिल की बातें होती वो,
न लगे कोई फ़साना,
मै और मेरा महखाना.

कसक उठी भी तो,
बोतलों में डूब जाना,
मै और मेरा महखाना,

तुमें भी ये तलब,
छोड़ दे "पाशा" पीना,
मै और मेरा महखाना.

Thursday, December 30, 2010

सच कहे हैं 'पाशा'

कुछ लोग बड़े ख़ास होते हैं,
वो तो दिल के पास होते हैं,
खुशबू सा अहसास ये,
सच कहे हैं 'पाशा'
जीने का अहसास होते हैं.

और कुछ नखरे होते हैं,
आँखों  के दर बंद होते हैं,
लौटने पर एक मुस्कान ये,
सच कहे हैं 'पाशा'
अंदाज़-ऐ-सौदाई होते हैं.

उफ़ तक ना हमसे होती हैं,
कल से आखें चार होती हैं,
दूसरो से बाते सरेआम ये,
सच कहे हैं 'पाशा'
अपने भी बेगाने होते हैं.

हर शेर उनके नज़र होते हैं,
कुछ दर्द-ऐ-बया होते हैं,
अजीब सी रंजीश ये,
सच कहे हैं 'पाशा'
दीवाने हम से ही होते हैं.

Monday, November 29, 2010

आग

जिंदगी एक बददुवा सी  लगती हैं,
हर ख़ुशी अधूरी सी लगती हैं.

बदल जाये ये हालात मेरे,
हर ठोकर चाहत सी लगती हैं.

अब रातो को हूँ जागता मैं,
नीद सुलगते संदल सी लगती हैं.

हर वक़्त दिल ने पुकारा तुझे,
धड़कने सीने में जलती सी लगती हैं.

कब बुझे आग मेरे दिल की,
अपनी राख भी अजनबी सी लगती हैं.

किस दिशा मे "पाशा" उठे कदम,
मौत भी मुझे परायी सी लगती हैं.

Friday, October 22, 2010

फ़रियाद

ऐ मेरे दो
जहान के मालिक
किस मस्जीद से
तुझे अजान दूँ

कब सुनेगा
फ़रियाद मेरी
कब होगी
मुराद पूरी

बना के मुझे
क्यु कर भूला
खाने को ठोकरे
किसके सहारे छोड़ा

कहे ऐ बुजुर्ग
मेरे मुझ से
तू है प्यासा
इबादत-ऐ-दिल के

कमी क्या थी
मेरी इबादत में
इतना तो बता
जो छोड़ा मझधार में

फिर पलटकर पूछूँगा
तुझसे क़यामत पर
क्यु कर मुक़दर
मेरा है मझधार पर

इल्ज़ाम तुझ पर
धरूँगा मैं ज़रूर
ये दोष तेरा तो
सज़ा सूनाउगा ज़रूर

तुज्हे भी अकेला
ही जीना होगा
और मिल्कीयत तेरी
दो जहान होगा

Monday, October 4, 2010

दर्द-ऐ-तड़प

ऐसे ही जिंदगी कटती रही,
अपने आप से शिकायते होती रही.

तेरा कसूर क्या इस में,
क्यु कर नसीबो की डोर टूटती रही.

अब सोच के हासिल भी नहीं,
दिल की मुराद पूरी कब होती रही.

अपनी ज़ुतजु में जीना है,
आरज़ू जिंदगी की छूटती रही.

मौत भी नहीं आती है,
ये तेरी तरह खिलवाड़ करती रही.

बता ऐ हम नफज़ मेरे,
मुझ से कौन सी कमी बाकी रही.

ना काबिल-ऐ-दुनिया मेरी,
मुझ पे यू बोझ  बनती रही.

ये तोहफा तेरा कबूल है,
मेरी आहे युही मगर जलती रही.

तेरा दिल भी तरसेगा कभी,
मेरी दर्द-ऐ-तड़प यह कहती रही.

सदके तेरे ये जिंदगी है,
मौत पाशा-ऐ-आगोश से लिपटी रही.

Saturday, August 21, 2010

हिदायते

किस तरह मै तुझे बताऊ,
चाहतो का सिलसिला आ बताऊ.

एक नज़र ही है ये जान लो,
उम्र भर अश्क का काफिला बताऊ.

सदा तो आती रहेगी चारसू,
दिल पर गुजरी घटाये बताऊ.

बरसी जो है आँख-ऐ-सौगाते,
चश्म-ऐ-बरसात को बताऊ.

हर समय की वो हिदायते,
या ये उनका है इलज़ाम बताऊ.

रफ़ाक़त के ना काबिल ही समझा,
अपने दिल की उलझन को बताऊ.

दिल को पर दुनिया से छुपाना,
और "पाशा" अपनो का भरम बताऊ.

Wednesday, August 18, 2010

आरजू

आँख से दूर ना हो दिल से उतर जाएगा,
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा.

इतना मायूस ना हो खिलावत-ऐ-गम से अपनी,
तू कभी खूद को देखेगा तो डर जाएगा.

तुम सर-ऐ-राह-ऐ-वफ़ा देखते रह जाओगे,
और वो बाम-ऐ-रफाकत से उतर जाएगा.

जिंदगी तेरी अता है तो ये जाननेवाला,
तेरी बक्षिश तेरी दहलीज़ पे धर जाएगा.

डूबते डूबते कश्ती को उछाल दे दूँ,
मैं नहीं तो कोई तो साहिल पे उतर जाएगा.

ज़ख़्म लाजिम है मगर दुःख है क़यामत का "पाशा"
ज़ालिम अब के भी ना रोयेंगा तो मर जाएगा.

Wednesday, July 28, 2010

फासले

फासले ना जाने कितने है,
ये सिलसिले ना जाने कितने है.

अब पास आना मुश्किल है,
ये सजाये ना जाने कितने है.

खामोश आहो से देंगे दूवाये,
आहे असरदार ना जाने कितने है.

काफिला तलाशता हूँ मैं,
राहे आसान ना जाने कितने है.

बिछड़े उनका क्या है "पाशा",
यादों में हम ना जाने कितने है.

Saturday, July 17, 2010

मतलब का यार

सच लोगो का कहना हुआ है,
मतलब का तू यार हुआ है.

खुशियों ने मुह मोड़ा है,
दिल टूटकर जार-जार हुआ है.

यह क्या कह दिया तूने के,
नश्तर सा चुबा हुआ है.

क्यु इतना गुरुर है तुझे,
क्या तू खुदा हुआ है.

दुवाए देते है तुझे "पाशा"
नाम मेरा बदनाम हुआ है.

Thursday, July 8, 2010

साथी

साथ निभाया हर एक वक़्त के बाद,
ज़िन्दगी कैसे कटे बिछड़ने के बाद.

जी भर गया मेरा तन्हाई से अब,
कौन जिये ज़िन्दगी मर जाने के बाद.

दुनिया से निभाई हर वफ़ा मैंने,
क्या याद ताल्लुक ऐ खुदगर्जी के बाद.

'पाशा' लौटकर तुझे दोस्त बनायेंगे,
इस ज़िन्दगी से निजात के बाद.