क्या रुखसत ऐ यार की घडी थी,
हसती हुई रात भी रो पड़ी थी.
हम खुद ही हुए तबाह वरना,
दुनिया को हमारी क्या पड़ी थी.
ये ज़ख्म है उन दिनों की यादें,
जब आपसे दोस्ती बढी थी.
जाते तो किधर को तेरे वहसी,
ज़ंजीर ऐ जूनून कड़ी पड़ी थी.
गम थे की आंधिया थी,
"पाशा" ऐ दिल की पंखुड़ियां,
बिखरी पड़ी थी.