तर्क ऐ ताल्लुक आमादा है, मैं क्या करू?
क़यामत होने पे आमादा है, मैं क्या करू?
हर बात की वजह हो शायद,
बात बेवजह आमादा है, मैं क्या करू?
ज़िन्दगी खुशबू से भरी हो शायद,
'इंसान' पे वैशियत आमादा है, मैं क्या करू?
बहार पर गुन्छे खिलते हो शायद,
हर वक़्त पतझड़ ही आमादा है, मैं क्या करू?
अब ज़िन्दगी से जी भरा "पाशा" शायद,
ज़िन्दगी ऐ निजात आमादा है, मैं क्या करू ?