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Saturday, July 3, 2010

बेदारी

इक ग़ज़ल उस पे लिखू, दिल का तकाजा है बहुत,
इन दिनों खुद से बिचड, जाने का डर है बहुत.

रात हो, दिन हो, गफलत हो की बेदारी हो,
उसको देखा तो नहीं है सोचा है बहुत.

तशनगी के भी मुकामत है क्या क्या, यानी,
कभी दरया नहीं काफी, कभी कतरा भी है बहुत.

मेरे हाथो की लकीरों के इजाफे है गवाह,
'पाशा' पत्थरो की तरह खुद को तराशा है बहुत.

3 comments:

  1. अच्छी गजल,वाह वाह

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  2. pasha bhai. badhiya hai.
    तशनगी के भी मुकामत है क्या क्या, यानी,
    कभी दरया नहीं काफी, कभी कतरा भी है बहुत.
    yeh lines kafi sundar hai

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  3. पाशा जी कृपया किसी और कि ग़ज़ल अपने नाम पर प्रकाशित न करे यह ग़ज़ल कृष्ण बिहारी नूर साहब की है जिसे आपने शब्दस: अपने नाम पर लिखा है

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