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Tuesday, May 11, 2010

ख्वाईश-ए-तमन्ना

किस्से तेरी नज़र ने,
सुनाये ना फिर कभी,
हमने भी दिल के दाग,
दिखाये ना फिर कभी.

ऐ याद-ए-दोस्त आज तू,
जी भर के दिल दूखा,
शायद ये रात हिज्र की,
आये ना फिर कभी.

वो मासूमियत दिल में,
मेरे रहेगी सदा, हाय!!
वापस लौटकर के यह दोस्त,
पाये ना फिर कभी.

मेरी आरज़ू विसाल-ए-दोस्त,
ना किसी हाल निबाई तूने,
तमन्ना-ए- दोस्ती "पाशा",
जागे ना फिर कभी.

3 comments:

  1. sneha agrawal, kanpurMay 14, 2010 at 5:06 PM

    ishme bhi baat wahi hai, aapse aisaa kon hai jo baat nahi karta aur aap unse baat karana chaahate hai

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